चौबे जी की चौपाल

भ्रष्टाचार  के मुद्दे पर अपनी बात आगे बढाते हुए चौबे जी बोले, कि कोई माने या ना माने मगर यही सच है राम भरोसे कि जनसेवक खातिर शिखर तक की यात्रा तभी संभव है जब वह भ्रष्टाचारी बाबा को शाष्टांग दंडवत करे । भ्रष्टाचारी बाबा की महिमा अपरंपार है बबुआ,जे इनके श्री चरणों में शीश नवावत हैं,उनके चहूँ ओर डंका बाजत हैं और मिलत हैं आशीर्वाद कि सर्वे भवन्तु सुखी रहs। यानी कि जब चाहे ओढा दs महंगाई की रजाई, रंगदारी करs खुलके क़ानून-व्यवस्था की देके दुहाई । बडफलदायक नाम हs भ्रष्टाचार,बडनसीब-बडभागी आऊर तारणहार हs भ्रष्टाचार। जिनके मिल जात हैं भ्रष्टाचारी बाबा के आशीर्वाद, उनके अन्ना,नन्ना,गन्ना,पन्ना केहू कुछ ना बिगार पावे। काहे कि पुलिस उनके आगे बेजार होई जात है, जनता निरीह आऊर लाचार होई जात है,रिश्ते-नाते सब उनके सामने बेकार होई जात है। दिन-दुनी रात-चौगुनी तरक्की करो,चारा खाके हाजमा बनाओ, कभी नहर-कभी बाँध,कभी तारकोल में डुबोकर सड़के खाओ। जितना पच सके पचाओ,यदि कोई अन्ना-वन्ना टाईप का खुरुश बुढा राह में रोड़ा बने तो साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाओ।ना माने तो तिहाड़ जेल पहुँचाओ, जईसे भी बन पड़े सुखी रहs। इहे समय की मांग है बबुआ,जे समझा ऊ राजा। जे ना समझा ऊ अन्ना।

लेकिन महाराज, परिस्थितियाँ बदल गई है आज। जबसे पहुंचे हैं अन्ना तिहाड़, भ्रष्टाचारी बाबा के ऊपर टूट पडा है दु:खों का पहाड़।हो गई है दिग्गी की घिग्घी बंद,अब नाही रहे कप्पू-पप्पू-सिब्बू भ्रष्टाचारी बाबा खातिर अक्लमंद।हर तरफ का दृश्य है उल्टा-पुल्टा, भूमिगत हो गई ससुरी घोटाली कुल्टा,खो गई बाबा की मनमोहनी मुस्कान, हाय रे हिन्दुस्तान। बोला राम भरोसे।

एकदम्म सच कहत हौ राम भरोसे भैया, भ्रष्टाचारी बाबा की लंगोट में फुलझड़ी खोंसके आजकल अन्ना गा रहे हैं क़ि बहुते मजा फकीरी में और उधर मौनी बाबा बडबडा रहे हैं भैया,क़ि अब नाही रहा कवनो टेस्ट सरकारी पंजीरी में । मगर जिबट वाली है हमरे भ्रष्टाचारी बाबा की सरकारी माई,बार-बार समझा रही है बाबा को क़ि तुम पहली आज़ादी वाले गांधी के अनुयायी हो बेटा,न बोलने और न देखने की बीमारी तो तुममे पहिले से है बस एक आऊर बीमारी डेवलप कर लेयो ना सुनने की,फिर तेरा कुछ भी नाही बिगाड़ पायेगा अन्ना। आज अन्ना मुखर है,कल शांत हो जायेंगे,फिर जनता वही सुनेगी जो हम सुनायेंगे। बोला गजोधर।

बरखुरदार ई का बकबक किये जा रहे हो, अन्ना को व्यायाम कराने वाले बाबा समझ लिए हो। अरे ऊ आंधी है,हमरे देश का नया गांधी है ।बोला रमजानी ।

इतना सुनके तिरजुगिया की माई चिल्लाई क़ि सावन के अंधे को हरतरफ हरिहरी दिखाई देता है, सारे नेता एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं चौबे जी । केकरो भीतर संकल्प नाम की चीज नाही, सबके सब यही सोच रहे हैं क़ि अन्ना के अनशन के ई बम भी डिफ्यूज कर दिहल जाई बाबा बम की तरह । फिर भ्रष्टाचार के बंद मिल खोल दिहल जाई, एतना दिन के घाटा कs भरपाई करे खातिर भ्रष्टाचा कs उत्पादन बढ़ा दिहल जाई । नए सिरे से फिर नया राजा आऊर नया कलमाडी तैयार कयल जाई । मनावल जाई नए रूप में भ्रष्टाचार कs त्यौहार,काहे क़ि बिना पईसा के कईसे होई नेतवन कs उद्धार । हम तs ईहे कहब अपने सर्मिले सरदार से क़ि सरदार धैर्य रखs, सभके एक दिन समय आवेला, तोहरो आई जब अन्ना के फुलझरी मुझाई। फेर हचक के खईहs लोगन, अपने मंत्री लोगन के खिलायिहs,विपक्ष के लॉलीपाप दिखईहs लोगन,जे केहू तोहरे कमाई के नज़रियाई ओकरा जी भरके लतिईहs लोगन। उद्देश्य बस एके रखीयहs नेता भवन्तु सुखिन: नेता सन्तु महामना।

 तिरजुगिया की माई कs बात मा दम्म है , हमके त s तरस आवत है जे मीठा-मीठा बोल के हमरे देश की तस्वीर बदले के सपना देखत हैं । के कहत हैं कि देश मा शान्ति चाही, देश क विकास चाहीं , रोटी -कपड़ा आऊर मकान चाहीं, रोजगार चाहीं ....अरे सत्यानाश हो तेरा गलती खुद करते हो आऊर दोष नेताओं को देते हो, जब तुलसीदास जी तक कह चुके हैं कि समरथ के नाही दोष गोसाईं , तब क्यों आ रही है हमरे देश की जनता को भ्रष्टाचार का नाम सुनकर उबकाई ? बताओ महाराज, अगर जनता को शान्ति की चिंता होती तो क्या वो गुंडे-बदमाशों-कातिलों को नेता बनाती ? यदि उसे रोटी-कपड़ा आऊर मकान की चिंता होती तो तो क्या वो दिन-रात झूठ बोलने वालों को नेता बनाती ? अगर उसे रोजगार की चिंता होती तो क्या वो अपना घर भरने वालों को नेता बनाती ? जैसी जनता-वैसा नेता । जनता अगर इस हाल में खुश है तो फिर वेचारे नेताओं को दोषी ठहराने से क्या फ़ायदा महाराज ? बोला गुलटेनवा ।

देख हमके राजनीति से कोई मतलब नाही आऊर ना ही नेतवन के घोषित-अघोषित दौलत से कुछ लेना-देना । हम्म इहो नाही मानत हईं कि सब नेता खराब है ,मगर सालों से उनके लूटने का क्रम चल रहा है । कोई देखने वाला नाही-कोई सुनने वाला नाही -कोई कुछ करने वाला नाही । खुद खायेंगे भ्रष्टाचार का महँगा पेंडा और हमरे हिस्से छोड़ देंगे खोखले वादे और कागजी योजनाएँ ताकि जिंदगी भर हम सब उसी में उलझे रहें आऊर नेतवन के प्रलोभन रुपी अंचार के चटकारे ले ले के खात रहें । इतना कहके चौबे जी ने अगले शनिवार तक के लिए चौपाल को स्थगित कर दिया ।

11 comments:

  1. बिल्‍कुल सही कहा है आपने, सार्थक एवं सटीक लेखन ... बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

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  2. पहले समझ में आया कि इस व्यंग्य में नेताओं को महिमामंडित किया गया होगा, किन्तु जैसे-जैसे पढ़ता गया स्थिति स्पस्ट होती गयी ...यह व्यंग्य नहीं समाज का यथार्थ है, आपका आभार !

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  3. इसे तो नेट पर जनसंदेश में मैं परसों ही पढ़ लिया था, किन्तु आज विस्तार से पढ़ने को मिला .

    उम्दा व्यंग्य,व्यंग्य के ऐसे सशक्त नाट्य रूपांतरण जिसमें आंचलिकता की खुशबू हो, पढ़कर मन बाग़-बाग़ हो गया !

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  4. अरे सत्यानाश हो तेरा गलती खुद करते हो आऊर दोष नेताओं को देते हो, जब तुलसीदास जी तक कह चुके हैं कि समरथ के नाही दोष गोसाईं , तब क्यों आ रही है हमरे देश की जनता को भ्रष्टाचार का नाम सुनकर उबकाई ? बताओ महाराज, अगर जनता को शान्ति की चिंता होती तो क्या वो गुंडे-बदमाशों-कातिलों को नेता बनाती ?

    क्या बात है, मनोज जी ने सही कहा है कि यह व्यंग्य समाज के कड़वे यथार्थ को रेखांकित कर रहा है ...बधाईयाँ !

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  5. चारा खाके हाजमा बनाओ, कभी नहर-कभी बाँध,कभी तारकोल में डुबोकर सड़के खाओ।

    सार्थक व्यंग्य....
    सादर...

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  6. बहुत सटीक अभिव्‍यक्ति .. आपके इस खास पोस्‍ट से हमारी वार्ता समृद्ध हुई है!!

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  7. बेहतरीन सार्थक एवं सटीक प्रस्‍तुति के लिये आभार!

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