नाम दो ना दो , पहचान बन ही जाती है - अन्योनास्ति ही सही . ! पर वह नाम बड़ा प्यारा होता है , जिसे जब जो पुकारता है और हम घूम जाते हैं - कुछ कहा क्या ? ' चलो यही नाम सही - अन्योनास्ति . मैं समय हूँ , मेरी पुकार पर अन्योनास्ति मुड़ेगा , अपनी पहचान दे जायेगा , यूँ ब्लॉग इक पहचान ही है -

एक चितेरा

एक चितेरा कभी मुझे भी मिला था,
बचपन में बनाता हुआ इन्द्रधनुषी पुल ,

मैंने उससे पूछा भी था ,
यह क्या करते हो ,

वह बोला भगवान के घर ,
जाने को पुल बनाता हूँ

मैंने फ़िर पूछा था ,
लेमन - चूस खाओगे ,

तब चाकलेट नहीं मिलते थे ,
यही मिलता था एक पैसे के दस ,
पर मुझे ऐसे ऐसे दो पुल बना कर दे दो ।

पूछा गया - क्या करोगे
उत्तर -भगवन से मिलाने जाउगा
प्रश्न - क्यों ?
कहूँगा सदगुर दद्दा को वापस भेजो |
पर दो क्यों ?
एक जाने एक वापस आने के लिए!!
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राम

क्यों आक्षेपित बार बार करते हो राम को ?
कुपुत्र कहलाते जो वन ना जाते
लेते न जो अग्नि-परीक्षा ,धर्म विरुद्ध तुम ही कहते !
धोबी के वचन को भरी सभा जो मर्म न देते ,
मात्र रघुवंशी चक्रवर्ती साम्राट राम तुम ही कहते |
क्या बार-बार के उन्ही आक्षेपों की है ग्लानि यह ?
जो अयाचित, राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हो
और भी आगे बढ,राम को भगवान के सिंहासन पर
बैठाते हो ||
कोई मेरे इस यक्ष-प्रश्न का उत्तर भी दे पायेगा ,
क्या ? राम सी मर्यादा किसी और ने भी निभाई है?
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उमर वो बचपन की "

अब क्या भूलूं क्या याद करूँ ,
लौटेगी न उमर वो बचपन की ,
वक्त से चाहे जितनी विनती-फरियाद करूँ ||
माँ का गुस्सा , दीदी की मनुहार ,
दद्दा का इकरार , बाबूजी का प्यार,
भूले-भटके मिलते थे कभी-कभी ,
माँ नरम ,बाबूजी गरम ,दीदी चि़ड़चिड़,दद्दा के तेवर ,
ब्याज में भौजाई से तकरार जमा-पूंजी यही बचपन की,
वो सब रह-रह याद करूँ उम्र जो गुज़री पचपन की ||
अब क्या भूलूं क्या याद करूँ ,
लौटेगी न उमर वो बचपन की ,
वक्त से चाहे जितनी विनती-फरियाद करूँ ||
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काश मैं भी हो पाता नीलकंठ "

कोशिश कर कभी सुनना विरानो के गीत ,
तन्हाई की सिसकियां भी होंगी ऐ अनजाने मीत !

खामोशी का संगीत जब भी आप गुनगुनायेंगे ,
लय की लरज़ में मुझे ही अकेला खडा पायेगे !

अपनी हर हर नज्म में ,कर्ण की रुसवाई को जीता हुआ
मुझे ही पायेंगें ,भीष्म की तन्हाईयों का विष पीता हुआ!

घायल रूहों का कारवां लिए,काँधे पे उठाये उम्मीदों का सलीब ;
सत्य-आग्रही गाँधी मैं हुआ नही, ,कहाँ से लाता ईसा सा नसीब !!

इस धरा की सारी रुसवाई : तनहाई का विष मैं पी जाता : जी जाता :
मैं भी होता अगर नीलकंठ , हो पाता मैं भी काश नीलकंठ !!
हो पाता मैं भी काश नीलकंठ !! मैं भी काश नीलकंठ!!
मैं भी नीलकंठ !!

अन्योनास्ति
http://anyonasti-kabeeraa.blogspot.com/
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अन्योनास्ति की इन अभिव्यक्तियों के बाद आइये मिलते हैं, ब्लॉगोत्सव में 

अमेरिका से आयीं डॉ.सुधा ओम ढींगरा से 

उनसे  बात करने जा रहे हैं हरफन मौला ब्लॉगर अविनाश वाचस्पति 

और भी बहुत कुछ है वहां :


Sudha_Om_Dhingra

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साक्षात्कार कवयित्री, कहानीकार, उपन्यासकार, पत्रकार, रंगमंच, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन कलाकार,...
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10 comments:

  1. चितेरा, राम, बचपन, नीलकंठ...
    सभी रचनाएं बेहतरीन....
    सादर आभार एवं बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  2. सभी रचनाएँ अच्छी लगीं...खासकर "नीलकंठ"
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ...आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. भावनात्मक संवंधों को अंतर्मन में उतरती अभिव्यक्ति, अच्छी लगी !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति है परिकल्पना की ,तारीफ़ जीतनी करूँ कम होगी !

    उत्तर देंहटाएं
  6. sabhi rachnaayen padhi bahut achchi lagi.achche link bhi mile.aabhar.

    उत्तर देंहटाएं

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