फरगुदिया : स्त्री जीवन और साहित्य------------ 
महिलाओं के जीवन के सार्थक पहलुओं की पड़ताल करता एक समूह जो विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों और कार्यशालाओं के माध्यम से अपनी पहचान बना रहा है. फरगुदिया नए आयामों के साथ निरंतर सृजनशील रहेगा - यह विश्वास फरगुदिया की ठोस जड़ें हैं  . हर लेखन -संस्कार,परम्परा,अन्याय के सशक्त विरोध,जीवन के विविध आयामों को विस्तृत आकाश देता है - इस आकाश के कुछ झिलमिलाते तारों को मैं इस उत्सव में लेकर आयी हूँ  ....

" 'साहित्य' शब्द का व्यवहार नया नहीं है। बहुत पुराने जमाने से लोग इस का व्यवहार करते आ रहे हैं, समय की गति के साथ इस का अर्थ थोड़ा-थोड़ा बदलता जरूर आया है। यह शब्द संस्कृत के 'सहित' शब्द से बना, जिस का अर्थ है 'साथ-साथ'। 'साहित्य' शब्द का अर्थ इसलिए 'साथ-साथ रहने का भाव' हुआ" - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

     साथ-साथ रहने की बात आती है तो अधिकतर व्यक्ति के जीवन साहित्य किसी न किसी रूप में विधमान है, महिलाओं की बात करें तो साहित्य में रूचि रखने वाली महिलाओं के लिए साहित्यिक पुस्तकें उनके लिए सखी की तरह होतीं हैं, गृहिणी हो या अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं की कितनी भी व्यस्त दिनचर्या हो वो अपने पसंद की साहित्यिक पुस्तकें पढने के लिए समय चुरा ही लेतीं हैं |
किसी ने कहा है कि 'साहित्य समाज का दर्पण है' .. इस कथन को ध्यान में रखते हुए देखें तो  मध्यमवर्गीय घरेलू महिलाएं कुछ हद तक बाहरी दुनिया से दूर रहतीं हैं , पुस्तकों के माध्यम से उन्हें बाहर की दुनिया को करीब से समझने का मौका मिलता है |
स्वयं अपने बारे में कहूँ तो स्कूल टाइम से ही रेणु जी को पढ़ते हुए ग्रामीण जीवन की  समस्याओं को जाना समझा, रेणु जी की लेखिनी  में साहित्य के अनूठे रूपों का दर्शन करने को मिला वहीँ महादेवी वर्मा , कबीर और सूरदास को पढ़ते हुए मन में अध्यात्म की सरिता प्रवाहित हुई |
 विवाह के बाद कुछ घरेलु व्यस्तताओं की वजह से पठन-पाठन से दूरी बनी रही , पति की जॉब के बाद रोजी रोटी के लिए महानगर का रुख करना पड़ा, बच्चे और पति अपनी पढाई और जॉब में व्यस्त रहते, ऐसे में कभी कभी अकेलेपन की वजह से जीवन अवसाद जैसी स्थिति आई लेकिन जब इंटरनेट के माध्यम से ब्लॉग पढना शुरू किया तो दोबारा एक नए रूप में साहित्य से मुलाकात हुई, साहित्यिक गोष्ठियों में जाने से खुद के भीतर एक अलग आत्मविश्वास पैदा हुआ, गोष्ठियों में शिरकत करने पर मुझे पुराने साहित्यकारों के साथ साथ नए कवियों और कथाकारों की पुस्तकें पढने का अवसर मिला, कुछ युवा और वरिष्ठ रचनाकाओं को पढ़कर एक बार फिर से यूँ लगा जैसे महानगर की दौड़ती  भागती सड़कों पर जीवन जैसी ज़िन्दगी को सड़क के किनारे लगे घने वृक्षों की छाँव मिल गयी,  पुस्तकों में एक बार फिर गाँव की छत से सुबह के सूरज और ढलते शाम की लाली भरे आकाश को निहारने जैसा अहसास हुआ, आत्मीय लेखन पढने के बाद लिखने की भी प्रेरणा मिली, कुछ वरिष्ठ और युवा पाठकों ने मेरे लेखन को सराहा तो पहले विश्वास नहीं हुआ फिर बाद में खुद में इतना आत्मविश्वास पाया की दूसरी महिलाओं को भी पढने के लिए प्रेरित किया , साहित्य पढ़कर और पढ़ा हुआ सखियों से साझा करके .. स्वयं में आये व्यावहारिक और रचनात्मक बदलाव के अनुभव साझा करके अपने साथ साथ बहुत सारी महिलाओं के व्यवहारिक जीवन में बदलाव देखा, सीधे सीधे शब्दों में कहूँ तो साहित्य से जुड़ाव हमेशा से ही खुद से मिलने जैसा रहा, जब दूरी रही तो लगा जीवन में कुछ अधूरा है , फिर से साहित्य को आत्मसात करना जेठ .. आषाढ़ की तपन के बाद सावन की पहली फुहार जैसा था |
 मन्नू भंडारी जी और सुधा अरोड़ा जी को पढ़कर साहित्य के एक दूसरे  रूप को देखा समझा , स्त्री जीवन से जुडी समस्याएँ खासतौर पर गृहिणियों की कुछ समस्याएँ बिलकुल अपनी सी लगी |
   गृहिणियां अपने घर परिवार की जिम्मेदारियों के प्रति बिलकुल समर्पित रहती है, अपनी रुचियों और जरूरतों को प्राथमिकता कम देती हैं , इस वजह से दोबारा पाठन शुरू करने में कुछ दिक्कतें आती हैं लेकिन उन अवरोधों  को पार करके एक बार फिर पढने की शुरुआत करने का अनुभव बहुत कुछ सिखा देता है |
इन्ही  अनुभवों से मन में कुछ प्रश्न उठे और ये लेख लिखने की प्रेरणा मिली .
अपनी प्रिय रचनाकारों को पढ़ते हुए महिलाएं कैसा अनुभव करती हैं .... अपनी व्यस्ततम दिनचर्या से कैसे समय निकालकर पढ़ती हैं ... कौन सी पुस्तकें पसंद हैं ... वरिष्ठ हो या युवा रचनाकार ...किससे और क्यों प्रभावित हैं .. ? जैसे प्रश्नों पर साहित्य में रूचि रखने वाली कुछ लेखिकाओं डॉ सोनरूपा विशाल, पुरोहित गीता,  इंदु सिंह, खुशबु गुप्ता , वंदना गुप्ता, निशा कुलश्रेष्ठ , मृदुला शुक्ला, दीपाली सांगवान, स्वाति ठाकुर, विजय पुष्पम पाठक, मीना धर, वसुंधरा पाण्डेय
 के विचार फरगुदिया पर प्रस्तुत है  जिनमें गृहिणियां,  छात्राएं व समाज सेवा से जुडी महिलाएं शामिल हैं  - 

शोभा मिश्रा 

"कई लेख और समीक्षा स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. कविताएँ लिखना मेरे लिए नितांत निजी अनुभवों को दोबारा जीने सरीखा है. घर के रोज़मर्रा के काम करते हुए किन क्षणों में कविता ज़हन में उतरती है, चाहूँ भी तो रेखांकित नहीं कर सकती. स्त्री-मन की स्वाभाविक सी इच्छाओं, सपनों और चाहना से बुनी ये कविताएँ स्वयं को अभिव्यक्त करने का माध्यम भर हैं"
                                                         - ऋतुपर्णा मुद्राराक्षस  
                                                  - 
1-
अपना आसमान खुद चुना है मैंने
आकांक्षाओं की पतंग का रंग भी
मेरी पसंद का है
डोर में बंधी चाहना की कलम से लिखी 
इबारत में करीने से
'निजता' और 'खुदमुख्तारी' बुना है.
बुर्जुआ चश्मे पहन जिसे
'स्वछंदता' और 'उद्दंडता' ही पढ़ते हो तुम
और घोषित करते हो सरेआम
कि खज़ाना और ज़नाना पर पर्देदारी वाजिब है.
बर्बर शब्दों की पगडण्डी में दुबके चोटिल अर्थ
और रुग्ण सोच का
अमलगम
क्यों मेरी मनःस्विता पर गोदते हो?
बताओ तो!

2.
'औरतें लिखती हैं कविताएँ इन दिनों...'
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औरतें लिखती हैं कविताएँ इन दिनों
अंतरिक्ष  के दायरे से बाहर फैले
अपने व्यक्तित्व के हिज्जे
कविताओं की स्लेट पर उड़ेलती हैं
कलम की नोंक पर
आसमान सिकुड़ आता है.

शब्दों की दहकती आंच में
मक्का के दानों सी भूंजती हैं  अनुभव
फूटते दानों की आवाज़
स्त्री-विमर्श के आंगन में
गौरय्या सी फुदकती है.

पृथ्वी के केंद्र में
दरकती चट्टानों सी विस्फोटक है
औरतों के ह्रदय की उथल-पुथल
उनकी कविताओं की इबारतों में
यह लावा बनकर बहती है.

3.'किताबें होती लड़की'

किताबों से अटी 
घर की कार्निस, मेजें और अलमारियां                                                      
पिता के किताबों से गहरे लगाव की
मौन पुष्टि करती थीं. 
घर के कमरे
किताबों के अभाव में रूखे दिखते हैं
पड़ोसियों और दोस्तों के घर जाकर                 
जाना लड़की ने
महंगे सजावटी सामान से सजे
वे कमरे                                                                                   
लड़की को थके और निष्प्रभ लगते.

पढ़ने  की लत,  लड़की को पिता से मिली थी
खाने की मेज़ पर,  माँ की डांट भी
उसे किताबों से दूर नहीं रख पाती
खाना खाते वक़्त, आज भी
लड़की जब कुछ पढ़ती है
माँ की अदृश्य आवाज़ में उलाहना सुन ही लेती है.

इतिहास की पुस्तकें पढ़ना
लड़की को पसंद आता
लेकिन दर्शन
सिर के ऊपर से निकल जाता
और साहित्य में,
कविता, कहानी, उपन्यास सभी कुछ भाता.

घर में पत्रिकाएँ भी खूब आतीं
'धर्मयुग' और 'साप्ताहिक हिंदुस्तान' से
दोस्ती उन वक्तों से थी
जबसे लड़की ने
अक्षर-अक्षर मिलकर शब्द पढ़ना सीखे
लड़की को याद है,
चार-पांच बरस की रही होगी वह
आबिद सुरती घर आये थे तब 
पिता से मिलने
ढब्बू जी ने
'धर्मयुग' के पृष्ठों से बाहर निकल
थोड़ी जगह लड़की की कॉपी में
तलाश ली थी
और लड़की ने 'कॉपी के ढब्बू जी' को
अपने सभी दोस्तों से मिलवाया था

उम्र बढ़ी, सोच का दायरा बढ़ा
किताबों के सान्निध्य  ने
लड़की को  शफ्फाक शीशे की मानिंद
पारदर्शी तार्किकता दी.

समय की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते 
वह दिन भी आया
जब लड़की ने अपना अलग घरौंदा बनाया 
किताबों से दोस्ती
टूटी नहीं तब भी
पिता जब भी नई किताब खरीदकर लाते
लड़की प्रफुल्लित हो जाती.
किताब पढने के बाद,
पिता-बेटी तन्मयता से
सविस्तार चर्चा करते उसपर
लड़की की समझ पर
पिता गर्वित हो उठते
और अक्सर ऐसे मौकों पर
भावुक हो लड़की को
अपना बौद्धिक वारिस बताते 
उनके जाने के बाद, उनकी किताबें
लड़की की धरोहर हैं,
पिता लड़की से कहा करते
लड़की सुनती और मुस्कुरा देती.

माँ गईं, फिर अनंत शून्य
पिता को भी लील गया.
लड़की ने महसूस किया
पिता के अवसान पर,
उसके रुदन में
पिता की किताबों का स्वर
सम्मिलित था.

माँ-पिता की गृहस्थी
मकान, घरेलू सामान,
रुपए-पैसे और गहनों में
तब्दील हो गई थी
जिसे तकसीम होना ही था
लड़की और उसके सहोदरों के मध्य
उस दिन, लड़की ने क्षण-भर सोचा
और अपने हिस्से में  धूप की तरह 
पिता की कुछ किताबें मांग ली.
इसे लड़की की नासमझी
और गैर -दुनियादाराना रवैये
की नज़र से देखा गया
लेकिन लड़की जानती थी
पिता अपना बौद्धिक उत्तराधिकारी
उसे ही मानते थे
उनकी बौद्धिक संपत्ति पर
हक़ उसी का था.

पिता की वे किताबें
लड़की ने
शादी में मिली माँ की साड़ियों सी
सहेज-संभालकर रखी हैं
पिता याद आते हैं  जब भी
उनकी किताबें
लड़की को पास बुला लेती हैं 
किताबें
जिनके पहले पन्ने पर                                                          
पिता के हस्ताक्षर में निहित
उनकी अशेष स्मृतियाँ
दोहराती हैं - 
शब्द ही शाश्वत हैं,
अक्षुण्ण हैं,  उम्र की जद से परे.
लाल फूलों से खिलते हैं
सृजन और विचार
शब्दों में ही!


          वे बचपन के दिन थे. मोहल्ले में दो बच्चों की मौत होने के बाद काना-फूसी शुरू हो गयी और एक बूढी विधवा को 'डायन' करार दिया गया. हम उन्हें प्यार से 'दादी' कहा करते थे. लोगों की ये बातें हम बच्चों तक भी पहुंचीं और हमारी प्यारी-दुलारी दादी एक 'भयानक डर' में तब्दील हो गयीं. उनके घर के पास से हम दौड़ते हुए निकलते कि वो पकड़ न लें. उनके बुलाने पर भी पास नहीं जाते. उनके परिवार को अप्रत्यक्ष तौर पर बहिष्कृत कर दिया गया. आज सोचती हूँ तो लगता है कि हमारे बदले व्यवहार ने उन्हें कितनी 'चोटें' दी होंगी. और ये सब इसलिए कि हमारी मानसिकता सड़ी हुई थी. जबकि हमारा मोहल्ला बौद्धिक(?) तौर पर परिष्कृत(?) लोगों का था!

वक़्त बीता, हालात बदले. पर डायन कहे जाने की यातना से स्त्री को आज भी मुक्ति नहीं मिली है. बिहार बिहार के दैनिक समाचार पत्रों में अक्सर ऐसी घटनाओं का जिक्र होता है जहाँ किसी औरत को डायन करार देकर उसकी हत्या कर दी जाती है ... पर इससे ये कतई न सोचें कि बिहार में ही ऐसी अमानवीय प्रथाएं हैं. ये बेशर्मी यहीं तक ही सीमित नहीं. संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2003 में जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में 1987 से लेकर 2003 तक, 2 हजार 556 महिलाओं को डायन कह कर मार दिया गया. 

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार अपने देश में 2008-2010 के बीच डायन कहकर 528 औरतों की हत्या की गयी. क्या ये आंकडे चौंकाने के लिए काफी नहीं कि मात्र एक अन्धविश्वास के कारण इतनी हत्याएं कर दी गयी? 

राष्ट्रीय महिला आयोग के मुताबिक भारत में विभिन्न प्रदेशों के पचास से अधिक जिलों में डायन प्रथा सबसे ज्यादा फैली हुई है. मीडिया के कारण (भले ये उनके लिए महज टी. आर. पी. या सर्कुलेशन बढ़ने का तमाशा मात्र हो) कुछ घटनायें तो सामने आ जाती हैं पर कई ऐसी कहानियां दबकर रह जाती होंगी. बेशक ये बातें आपके-हमारे बिलकुल करीब की नहीं, गांव-कस्बों की हैं. किसी खास समुदाय या वर्ग की हैं, पर सिर्फ इससे, आपकी-हमारी जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती. 

ध्यान दें, अखबार में छपी वे बातें महज़ खबरें नहीं, जिन्हें एक नज़र देखकर आप निकल जाते हैं. इनमें एक स्त्री की 'चीख' है, उसका 'रुदन' है, उसकी 'अस्मिता' के तार-तार किये जाने की कहानी है, अन्धविश्वास का भंवर जिसका सब कुछ डुबो देता है और हमारा 'सभ्य' समाज इसे 'डायन' कहकर खुश हो लेता है. 

'डायन', क्या इसे महज अन्धविश्वास, सामाजिक कुरीति मान लिया जाये या औरतों को प्रताड़ित किये जाने का एक और तरीका. आखिर डायन किसी स्त्री को ही क्यूँ कहा जाता है? क्यूँ कुएं के पानी के सूख जाने, तबीयत ख़राब होने या मृत्यु का सीधा आरोप उसपर ही मढ़ दिया जाता है? असल में औरतें अत्यंत सहज, सुलभ शिकार होती हैं क्यूंकि या तो वो विधवा, एकल, परित्यक्ता, गरीब,बीमार, उम्रदराज होती हैं या पिछड़े वर्ग, आदिवासी या दलित समुदाय से आती हैं, जिनकी जमीन, जायदाद आसानी से हडपी जा सकती है. ये औरतें मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से इतनी कमजोर होती हैं कि अपने ऊपर होने वाले अत्याचार की शिकायत भी नहीं कर पातीं. पुलिस भी अधिकतर मामलों में मामूली धारा लगाकर खानापूर्ति कर लेती है.

हैरानी होती है कि लगभग हर गाँव या कस्बे में किसी न किसी औरत को 'डायन' घोषित कर दिया जाता है. मैंने कहीं नहीं देखा कि कभी किसी पुरूष को डायन कहा गया हो. या इस आधार पर उसकी ह्त्या कर दी गयी हो. क्यूंकि ऐसे में अहम् की संतुष्टि कहां हो पाएगी. और यह बात कहने-सुनने तक ही कहां सीमित होती है. जब भीड़ की 'पशुता' अपनी चरम पर पहुंचती है तब डायन कही जानेवाली औरत के कपडे फाड़ दिए जाते हैं... तप्त सलाखों से उन्हें दागा जाता है... मैला पिलाया जाता है... लात-घूसों, लाठी-डंडों की बौछारें की जाती है ...नोचा-खसोटा जाता है और इतने पर मन न माने तो उसकी हत्या कर दी जाती है. उनमें से कोई अगर बच भी जाये तो मन और आत्मा पर पर लगे घाव उसे चैन से कहा जीने देते हैं. 'आत्महत्या' ही उनका एकमात्र सहारा बन जाता है. 

औरतों पर अत्याचार और उनके ख़िलाफ़ घिनौने अपराधों को लेकर अक्सर आवाज़ उठाई जाती है. लेकिन ऐसी घटनायें हमें हमारा असली चेहरा दिखाती हैं. हम स्वयं को 'सभ्य' कहते और मानते हैं पर इनमें हमारा खौफनाक 'आदिम' रूप ही दीखता है. हमने इसकी आदत बना ली है. ये शर्मनाक है....पर हम भी, पूरे बेशर्म हैं!

स्वयंबरा बक्षी - 
परिकल्पना ब्लॉगोत्सव में आज बस इतना ही, मिलती हूँ कल फिर इसी समय परिकल्पना पर......एक नई प्रस्तुति के साथ। 

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